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✦ उज्जैन • 27 मार्च–27 मई 2028

जहाँ आस्था बन जाती है एक शाश्वत यात्रा।

पवित्र शिप्रा के तट पर उज्जैन, सिंहस्थ 2028 में विश्व का स्वागत करता है—बारह वर्षों में एक बार होने वाला आस्था, जीवंत परंपरा और आध्यात्मिक जागरण का महासंगम। प्रथम पवित्र स्नान से आरंभ करें, तीन भव्य शाही स्नान (अमृत स्नान) के साक्षी बनें और पूर्णाहुति—पावन समापन—तक की आध्यात्मिक यात्रा पूरी करें।

पावन शुभारंभ27 मार्च 2028प्रथम पवित्र स्नान
प्रथम शाही स्नान (अमृत स्नान)09 अप्रैल 2028शाही पेशवाई एवं पवित्र स्नान
द्वितीय शाही स्नान (अमृत स्नान)23 अप्रैल 2028महा अमृत स्नान
अंतिम शाही स्नान (अमृत स्नान)08 मई 2028समापन शाही स्नान
पावन समापन27 मई 2028पूर्णाहुति
पवित्र पंचांग के अनुसार योजना बनाएँ

सिंहस्थ 2028 की प्रमुख स्नान तिथियाँ

मंगल आरंभ से पूर्णाहुति तक प्रत्येक तिथि का अपना आध्यात्मिक महत्व है। प्रमुख शाही स्नान (अमृत स्नान) तिथियों को विशेष रूप से दर्शाया गया है, ताकि श्रद्धालु महत्वपूर्ण शाही पेशवाइयों के अनुसार अपनी यात्रा की योजना बना सकें।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

पवित्र उद्घाटन स्नान और सिंहस्थ का शुभारंभ

चैत्र शुक्ल नवमी

सूर्य का मेष राशि में प्रवेश; अत्यंत शुभ धार्मिक अवसर

प्रथम शाही स्नान (अमृत स्नान)

अखाड़ों और नागा साधुओं के नेतृत्व में शाही स्नान

सूर्योदय के समय वैशाख कृष्ण पंचमी

पितृ प्रार्थना और आत्मशुद्धि का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन

वैशाख कृष्ण दशमी

पारंपरिक पवित्र स्नान और आध्यात्मिक अनुष्ठान

द्वितीय शाही स्नान (अमृत स्नान)

सिंहस्थ का सबसे विशाल शाही स्नान दिवस

वैशाख शुक्ल सप्तमी

व्रत, भक्ति और पवित्र स्नान का विशेष दिन

वैशाख शुक्ल एकादशी

बुद्ध पूर्णिमा और पवित्र स्नान दिवस

अंतिम शाही स्नान (अमृत स्नान)

सिंहस्थ का भव्य अंतिम शाही स्नान

ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी

आध्यात्मिक शुद्धि और पितृ तर्पण का दिन

समापन समारोह — पूर्णाहुति

पवित्र महापर्व का विधिवत और प्रार्थनामय समापन

🔥 सिंहस्थ 2028 ट्रैवल प्लानर

महाकालेश्वर मंदिर के पास होटल खोजें

शाही स्नान और भीड़भाड़ वाले दिनों के लिए अपनी उज्जैन यात्रा पहले से प्लान करें।

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उज्जैन कुंभ मेला और सिंहस्थ कुंभ मेला का आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और ज्योतिषीय महत्व

उज्जैन कुंभ मेला, जिसे विशेष रूप से सिंहस्थ कुंभ मेला कहा जाता है, भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आयोजन केवल उज्जैन में ही आयोजित होता है और इसका संबंध सीधा वैदिक ज्योतिष, कालगणना और सनातन धार्मिक अनुशासन से जुड़ा हुआ है। अन्य कुंभ स्थलों से भिन्न, सिंहस्थ का निर्धारण विशेष ग्रह-नक्षत्र स्थिति के आधार पर किया जाता है।

जब बृहस्पति ग्रह सिंह राशि में प्रवेश करता है और सूर्य विशिष्ट राशि संयोग में स्थित होता है, तब उज्जैन में सिंहस्थ का आयोजन होता है। यह ज्योतिषीय संयोजन अत्यंत दुर्लभ माना जाता है, इसलिए सिंहस्थ कुंभ मेला लगभग 12 वर्षों के अंतराल पर आयोजित होता है। यह केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय समय-चक्र और आध्यात्मिक ऊर्जा के पुनर्संतुलन का पर्व है।

उज्जैन का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व

उज्जैन प्राचीन काल से ही भारत की समय-गणना और ज्योतिष विद्या का प्रमुख केंद्र रहा है। इसे प्राचीन ग्रंथों में अवंतिका नगरी के नाम से उल्लेखित किया गया है। यहां स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पूरे भारत में विशेष श्रद्धा का केंद्र है। इसी कारण सिंहस्थ का आयोजन उज्जैन में ही निर्धारित है, क्योंकि यह स्थान शैव परंपरा और वैदिक ज्योतिष का संगम है।

क्षिप्रा नदी के तट पर होने वाला पवित्र स्नान सिंहस्थ का मुख्य अनुष्ठान है। मान्यता है कि इस काल में क्षिप्रा का जल आध्यात्मिक रूप से अत्यंत पवित्र और ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाता है। करोड़ों श्रद्धालु शाही स्नान के दौरान पवित्र डुबकी लगाकर आत्मशुद्धि और मोक्ष की कामना करते हैं।

सिंहस्थ कुंभ मेला की प्रमुख परंपराएँ

सिंहस्थ के दौरान विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत, नागा संन्यासी और धार्मिक परंपराओं के प्रतिनिधि शाही स्नान में भाग लेते हैं। यह क्रम अत्यंत अनुशासित और पारंपरिक व्यवस्था के अंतर्गत संपन्न होता है। अखाड़ों की पेशवाई, ध्वज स्थापना और धार्मिक प्रवचन इस आयोजन की विशिष्ट पहचान हैं।

सिंहस्थ केवल स्नान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक साधना, दान, यज्ञ, जप और शास्त्र-चर्चा का भी महापर्व है। यहां धर्म, दर्शन और सनातन परंपरा का जीवंत स्वरूप देखने को मिलता है।

सिंहस्थ का सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रभाव

उज्जैन सिंहस्थ भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु, संत और विद्वान इस आयोजन में सम्मिलित होकर आध्यात्मिक संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान करते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता का भी प्रतीक है।

सिंहस्थ कुंभ मेला उज्जैन की पहचान है और यह आयोजन भारतीय सभ्यता की निरंतरता को दर्शाता है। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सनातन धर्म की जीवित धरोहर है जो युगों से चली आ रही है।